अगर कोई कहे कि कोयल को हम कैसे पहचान सकते हैं तो अनायास ही मुख से निकल पड़ता है -"कायल की कूक-कूक की बोली से". अगर कोई किसी कोटर में ची-ची कर रहा हो तो हम अनुमान लगा लेते हैं कि हो-न-हो यह छोटी सी नन्ही सी चिड़िया "गोरैया" ही होगी. जिस तरह किसी जंगल या चिड़ियाघर में दहाड़ सुनकर मन में शेर या बाघ उभर कर सामने आ जाता है. ऐसे ही न जाने कितने ही उदाहरण होंगे जिसमे किसी जीव या व्यक्ति की पहचान उसके अपने भाषा से होती है. यहाँ भाषा का तात्पर्य देश की भाषा से है, एक ऐसी भाषा जिससे देश की पहचान जुड़ी हुई हो. जहाँ के किसी व्यक्ति की बात सुनने से ही पता चल जाये की वह किस देश का है, चाहे उसकी छवि हमारे सामने हो या न हो. आप किसी का मुख्पटल देख कर यह कह सकते हैं की वह किस देश का हो सकता है ? अनुमान भर लगा सकते हैं..... पर यदि आपको भाषा का ज्ञान हो, तो आप बिना किसी अनुमान से यह कह सकते हैं कि जो व्यक्ति बात कर रहा है वह किस देश का हो सकता है. भाषा किसी भी देशवासी के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहचान है.
आज "१४ सितम्बर" हिंदी दिवस है....
....."शेष भाग बाद में"
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