Thursday, August 25, 2011

हाथों में मशाल लिए समक्ष आ रहा प्रतिकार है


महंगाई, गरीबी और भ्रष्टाचार से त्रस्त
हम भारत के जानता कर रहे चीत्कार हैं.
सर पे बिठाया जिनको सरकार बनाया जिनको
सुनने को हमारी पीड़ा आज वे क्यों नहीं तैयार हैं?

देखो कैसे देश के लिए एक देशभक्त अण्णा
पिछले दस दिनों से अनसन कर हो रहे बीमार हैं.
और दूसरी तरफ जानता के पैसों से कहीं पर
सरकार के नुमाईंदे मना रहे जश्न-ए-इफ़्तार हैं.

दलीलें देकर विधेयकों का पुलिंदा बांधती है यह सरकार
ज़रा बताये कितनों का आज तक किया जनोद्धार है.
यह नेता संसद में पैसा खाकर, संसद को सर्वोच्च बताकर
संविधान की आड़ में करती जानता का बलात्कार है.

मुर्ख हैं वे नेता जो आज कह रहे जनता से
अन्ना-आंदोलन एक असंवेधानिक दुराचार है.
है कोई जवाब, जानता के करोड़ों रुपयों से चलती
लोकसभा आज सिर्फ एक आम मछली बाजार है.

2जी में राजा, कैश फॉर वोट में सिंह, चारा खाने में यादव,
एयर-इंडिया को डुबोया पटेल ने, कृषि घोटाले में पवार है.
अरे जो करते हैं संसद में खरीद-बिक्री-व्यापार
ऐसे लोगों की क्या आज हमें और इस देश को दरकार है?

जिन्होंने गरीबी देखी नहीं, जिन्होंने भुख कभी सहा नहीं
कैसे बनायेंगे सशक्त विधेयक वे उनका क्या आधार है?
जन के लिए कुछ करते नहीं, जन की भावना समझते नहीं
कैसे उम्मीद करें इनसे कि सुनेगें हम जनों का जो विचार है.

अंत में जब बचता नहीं कुछ आम जानता के हाथ में
उठती तब हुंकार किसी की, बदलता तब व्यवहार है.
समय सिमित है अभी संभल जाएँ वे सुन के जन-जन गाँधीवाणी
वरना हाथों में मशाल लिए समक्ष आ रहा प्रतिकार है...
हाथों में मशाल लिए समक्ष आ रहा प्रतिकार है............

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-------विश्वजीत 

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